Saturday, November 13, 2010

खुद की तलाश में.

भटक रही हूँ मैं सहारे की तलाश में ......

.नदी सी बह रही हूँ, किनारे की आस में.......

.खो रही हूँ अँधेरे में.........

.रौशनी की तलाश में.......

खुद में ही उलझी हुई हूँ........

खुद की तलाश में............

Sunday, August 29, 2010




प्यार
क्या है ज़रा सोचकर देखिए,
ढाई अक्षर में रब खोजकर देखिए,
जिंदगी और जन्नत इसी में बसे,
बूंद से आप सागर निचोड़कर देखिए,
प्यार क्या है..............
कभी माँ की ममता में बसता है ये रब,
कभी बन के दिल भी धड़कता है ये रब,
कभी कच्चे रेशम के धागों में बंधकर,
किसी की कलाई पे सजता है ये रब,
भूलकर खुद को बस इसी के होकर देखिए,
प्यार क्या है..............
कभी जब इबादत में झुकता है ये रब,
तभी मीरा और कबीर बनता है ये रब,
कभी भेद अपने पराए का मिटाकर,
बेर शबरी के जाकर के चखता है ये रब,
कभी इसको दिल से जोड़कर देखिए,
प्यार क्या है................
सरहदों में सिमटकर रह सका ये कहाँ कब,
बँटा ये अब तक भले बंट गया सब,
मिटा दे दिलों से नफरतों के असर को,
है ज़रूरत इसी एक जज़्बात की अब,
घुटन की ये ज़ंजीर तोड़कर देखिए,
प्यार क्या है ज़रा सोचकर देखिए,
ढाई अक्षर में रब खोजकर देखिए.............

Saturday, August 21, 2010

मैने बेटी बन जन्म लीया,
मोहे क्यों जन्म दीया मेरी माँ
जब तू ही अधूरी सी थी!
तो क्यों अधूरी सी एक आह को जन्म दीया,
मै कांच की एक मूरत जो पल भर मै टूट जाये,
मै साफ सा एक पन्ना जिस् पर पल मे धूल नजर आये,
क्यों ऐसे जग मै जनम दीया, मोहे क्यों जनम दीया मेरी माँ,
क्यों उंगली उठे मेरी तरफ ही, क्यों लोग ताने मुझे ही दे
मै जित्ना आगे बढ़ना चाहू क्यों लोग मुझे पिछे खीचे!
क्यों ताने मे सुनती हू माँ,मोहे क्यों जन्म दीया मेरी माँ?
by monika chouhan
Mein beti bankar aayi hoon Maa-baap ke jeevan mein
Basera hai aaj, kal mera kisi aur ke aangan mein

Kyon yeh reet bhagwan ne banayi hogi
kehte hain aaj nahi toh kal tu parayi hogi

De kar janam pal-poskar jisne hamein bada kiya
aur waqt aaya toh unhi haathon se hamein vida kiya

betiya isse samajhkar paribhasha apne jeevan ki
bana deti hai abhilasha ek atoot bandhan ki

kyon rishta hamara itna ajeeb hota hai
kya bas yahi hum betiyon ka naseeb hota hai




os ki bundo ki tarah hoti hai betiya,
maa baap ki dulari hoti hai betiya,
jaan se pyari hoti hai betiya,
maa baap k dard me hmdard hoti hai betia,
roshan karega beta to bs ek hi kul ko
2 2 kul ki laaj hoti hai betiya,
heera hai agar beta to sacha moti hai betiya
kanto ki raha pr chalti h betiya,
auro ki raha me ful banti hai betiya,
kahne ko parayi amanat hai betiya,
pr beto se b apni hoti hai betia..!!

posted by monika chouhan
हम तो बचपन में भी अकेले थे

सिर्फ़ दिल की गली में खेले थे


एक तरफ़ मोर्चे थे पलकों के
एक तरफ़ आँसूओं के रेले थे


थीं सजी हसरतें दूकानों पर
ज़िन्दगी के अजीब मेले थे


आज ज़ेहन-ओ-दिल भूखों मरते हैं
उन दिनों फ़ाके भी हमने झेले थे


ख़ुदकुशी क्या ग़मों का हल बनती
मौत के अपने भी सौ झमेले थे
ढँके जज्बात -


अब मै ढाँप लेती हूँ
अपने जज्बातो को तुमसे भी
और ओढ़ लेती हूँ
एक स्वाँग भरी मुस्कान को
छुपा लेती हूँ सारा दर्द
आवाज में भी.
तुम भेद ही नही पाते
इस चक्रव्यूह को,
नही देख पाते
स्वाँग भरी मुस्कान के पीछे
के चेहरे का दर्द.
मेरी आवाज का कंपन
कहीं तुम्हारी ही खनक में
विलीन हो जाता हैं.
तुम स्वयं मे मदहोश हो,
गफलत में हो, कि
मै संभल गयी हूँ
तुम्हारे दिये दर्द से..
किंतु सच....?
सच कुछ और ही हैं.
मै भीतर ही भीतर
पल-पल बिखरती हूँ..
टूटती हूँ.
मगर हर लम्हा
प्रयास-रत रहती हूँ..
अपने में ही सिमटे रहने को..
नही चाहती अब
मै तुम्हे अपनी आहें
सुनांना.
क्युँकि सुना कर भी
देख चुकी हूँ
और बदले में तुम्हारी
रुसवाईयाँ ही पायी हैं.
इसलिये अब मैने
अपने चारो ओर
खडी कर दी हैं
एक अभेद्य दीवार
जिसके भीतर
झांकने की
सबको मनाही हैं
और तुमको भी
मै
जब तुम में
खो जाता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ

जब बात हद से
गुजर जाती है
मेरे दिल कि गहराइयो में
उतर आती है
तो मौन हो जाता हूँ

जब देखती हो
तुम मेरी आँखों में
मै सपनो में
खो जाता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ

जब यूँ ही
बे बात मुस्का
जाती हो तुम
मै सचमुच
खिल जाता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ

जब बिखेर देती हो तुम
अपना सारा प्यार मुझ पर
मै उसे सारा
समेट नहीं पता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ

जब तुम्हे छूने कि ललक
दौड़ जाती है ह्रदय में
खुद को रोक
नहीं पता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ

जब चाहता हूँ तुमसे
बहुत बात करना
पास तेरे आता हूँ
कुछ कह नहीं
मगर पता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ

चाहता हूँ तुम्हे
यूँ ही देखता रहू खामोश
तुम्हे देखने कि चाहत में
मै सब कुछ
भूल जाता हूँ
तो मौन हो जाता हूँ
धूप ही क्यों

धूप ही क्यों छांव भी दो
पंथ ही क्यों पांव भी दो
सफर लम्बी हो गई अब,
ठहरने को गांव भी दो ।

प्यास ही क्यों नीर भी दो
धार ही क्यों तीर भी दो
जी रही पुरुषार्थ कब से,
अब मुझे तकदीर भी दो ।

पीर ही क्यों प्रीत भी दो
हार ही क्यों जीत भी दो
शुन्य में खोए बहुत अब,
चेतना को गीत भी दो ।

ग्रन्थ ही क्यों ज्ञान भी दो
ज्ञान ही क्यों ध्यान भी दो
तुम हमारी अस्मिता को,
अब निजी पहचान भी दो





मंज़िल पे ध्यान

मंज़िल पे ध्यान हमने ज़रा भी अगर दिया,
आकाश ने डगर को उजालों से भर दिया।

रुकने की भूल हार का कारण न बन सकी,
चलने की धुन ने राह को आसान कर दिया।

पीपल की छाँव बुझ गई, तालाब सड़ गए,
किसने ये मेरे गाँव पे एहसान कर दिया।

घर, खेत, गाय, बैल, रक़म अब कहाँ रहे,
जो कुछ था सब निकाल के फसलों में भर दिया।

मंडी ने लूट लीं जवाँ फसलें किसान की,
क़र्ज़े ने ख़ुदकुशी की तरफ़ ध्यान कर दिया।

रिश्ते

अक्सर रिश्तों को रोते हुए देखा है,
अपनों की ही बाँहो में मरते हुए देखा है
टूटते, बिखरते, सिसकते, कसकते
रिश्तों का इतिहास,
दिल पे लिखा है बेहिसाब!
प्यार की आँच में पक कर पक्के होते जो,
वे कब कौन सी आग में झुलसते चले जाते हैं,
झुलसते चले जाते हैं और राख हो जाते हैं!
क्या वे नियति से नियत घड़ियाँ लिखा कर लाते हैं?
कौन सी कमी कहाँ रह जाती है
कि वे अस्तित्वहीन हो जाते हैं,
या एक अरसे की पूर्ण जिन्दगी जी कर,
वे अपने अन्तिम मुकाम पर पहुँच जाते हैं!
मैंने देखे हैं कुछ रिश्ते धन-दौलत पे टिके होते हैं,
कुछ चालबाजों से लुटे होते हैं-गहरा धोखा खाए होते हैं
कुछ आँसुओं से खारे और नम हुए होते हैं,
कुछ रिश्ते अभावों में पले होते हैं-
पर भावों से भरे होते है! बड़े ही खरे होते हैं !
कुछ रिश्ते, रिश्तों की कब्र पर बने होते हैं,
जो कभी पनपते नहीं, बहुत समय तक जीते नहीं
दुर्भाग्य और दुखों के तूफान से बचते नहीं!
स्वार्थ पर बनें रिश्ते बुलबुले की तरह उठते हैं
कुछ देर बने रहते हैं और गायब हो जाते हैं;
कुछ रिश्ते दूरियों में ओझल हो जाते हैं,
जाने वाले के साथ दूर चले जाते हैं !
कुछ नजदीकियों की भेंट चढ़ जाते हैं,
कुछ शक से सुन्न हो जाते हैं !
कुछ अतिविश्वास की बलि चढ़ जाते हैं!
फिर भी रिश्ते बनते हैं, बिगड़ते हैं,
जीते हैं, मरते हैं, लड़खड़ाते हैं, लंगड़ाते हैं
तेरे मेरे उसके द्वारा घसीटे जाते हैं,
कभी रस्मों की बैसाखी पे चलाए जाते हैं!

पर कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं
जो जन्म से लेकर बचपन जवानी - बुढ़ापे से गुजरते हुए,
बड़ी गरिमा से जीते हुए महान महिमाय हो जाते हैं !
ऐसे रिश्ते सदियों में नजर आते हैं !
जब कभी सच्चा रिश्ता नजर आया है
कृष्ण की बाँसुरी ने गीत गुनगुनाया है!
आसमां में ईद का चाँद मुस्कराया है!
या सूरज रात में ही निकल आया है!
ईद का चाँद रोज नहीं दिखता,
इन्द्रधनुष भी कभी-कभी खिलता है!
इसलिए शायद - प्यारा खरा रिश्ता
सदियों में दिखता है, मुश्किल से मिलता है पर,
दिखता है, मिलता है, यही क्या कम है




रिश्ते


रिश्तों को सीमाओं में नहीं बाँधा करते
उन्हें झूँठी परिभाषाओं में नहीं ढाला करते

उडनें दो इन्हें उन्मुक्त पँछियों की तरह
बहती हुई नदी की तरह
तलाश करनें दो इन्हें अपनी सीमाएं
खुद ही ढूँढ लेंगे उपमाएं

होनें दो वही जो क्षण कहे
सीमा वही हो जो मन कहे

Friday, August 20, 2010

हिचकियों से एक बात का पता चलता है,
कि कोई हमे याद तो करता है,
बात न करे तो क्या हुआ,
कोई आज भी हम पर कुछ लम्हे बरबाद तो करता है

ज़िंदगी हमेशा पाने के लिए नही होती,
हर बात समझाने के लिए नही होती,
याद तो अक्सर आती है आप की,
लकिन हर याद जताने के लिए नही होती

महफिल न सही तन्हाई तो मिलती है,
मिलन न सही जुदाई तो मिलती है,
कौन कहता है मोहब्बत में कुछ नही मिलता,
वफ़ा न सही बेवफाई तो मिलती है

कितनी जल्दी ये मुलाक़ात गुज़र जाती है
प्यास भुजती नही बरसात गुज़र जाती है
अपनी यादों से कह दो कि यहाँ न आया करे
नींद आती नही और रात गुज़र जाती है

उमर की राह मे रस्ते बदल जाते हैं,
वक्त की आंधी में इन्सान बदल जाते हैं,
सोचते हैं तुम्हें इतना याद न करें,
लेकिन आंखें बंद करते ही इरादे बदल जाते हैं

कभी कभी दिल उदास होता है
हल्का हल्का सा आँखों को एहसास होता है
छलकती है मेरी भी आँखों से नमी
जब तुम्हारे दूर होने का एहसास हो
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,

चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है.

मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,

चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है.

आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,

जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है.

मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,

बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में.

मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती.

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो.

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,

संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम.

कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
मै तो मखमली धोरों की उपज हूँ
ज़िन्दगी पथरीले पहाड़ों से कैसे टकरा गई ?
शुष्क वसुधा है ज़न्म्स्थली मेरी
फिर नैनों में इतनी नदियाँ कहाँ से आ गई ?
इस रात की तनहाइयों के, सब रंग बदल गए हैं..!
चाँद निकला है जैसे, वैसे ही अंधेरे बदल गए हैं..!!

जिन के भरोसे थी खुशियाँ, वो बादल ठहर गए हैं..!
मंजिलें तो अब भी वही हैं, कुछ रास्ते बदल गए हैं..!!

जिन पे किया था भरोसा हमने, वो दोस्त छूट गए हैं..!
देखे थे हमने जो, वो ख्वाब बदल गए हैं..!!

जो बने थे कभी हमसफ़र, आज वो ही मुकर गए हैं..!
इस टूटे हुए दिल के, सारे जज्बात बदल गए हैं..!!

न बदले कभी हम, न बदले हमारे ख़यालात..!
बस रोना है ये ही, की कुछ लोग बदल गए हैं..!!

Sunday, August 8, 2010

Chalna Hamara Kaam Hai
चलना हमारा काम है
- शिवमंगल सिंह 'सुमन' (ShivMangals singh suman )



गति प्रबल पैरों में भरी
फिर क्यों रहूं दर दर खडा
जब आज मेरे सामने
है रास्ता इतना पडा
जब तक न मंजिल पा सकूँ,
तब तक मुझे न विराम है,
चलना हमारा काम है ।

कुछ कह लिया, कुछ सुन लिया
कुछ बोझ अपना बँट गया
अच्छा हुआ, तुम मिल गई
कुछ रास्ता ही कट गया
क्या राह में परिचय कहूँ,
राही हमारा नाम है,
चलना हमारा काम है ।

जीवन अपूर्ण लिए हुए
पाता कभी खोता कभी
आशा निराशा से घिरा,
हँसता कभी रोता कभी
गति-मति न हो अवरूद्ध,
इसका ध्यान आठो याम है,
चलना हमारा काम है ।

इस विशद विश्व-प्रहार में
किसको नहीं बहना पडा
सुख-दुख हमारी ही तरह,
किसको नहीं सहना पडा
फिर व्यर्थ क्यों कहता फिरूँ,
मुझ पर विधाता वाम है,
चलना हमारा काम है ।

मैं पूर्णता की खोज में
दर-दर भटकता ही रहा
प्रत्येक पग पर कुछ न कुछ
रोडा अटकता ही रहा
निराशा क्यों मुझे?
जीवन इसी का नाम है,
चलना हमारा काम है ।

साथ में चलते रहे
कुछ बीच ही से फिर गए
गति न जीवन की रूकी
जो गिर गए सो गिर गए
रहे हर दम,
उसी की सफलता अभिराम है,
चलना हमारा काम है ।

फकत यह जानता
जो मिट गया वह जी गया
मूंदकर पलकें सहज
दो घूँट हँसकर पी गया
सुधा-मिक्ष्रित गरल,
वह साकिया का जाम है,
चलना हमारा काम है ।

Wednesday, August 4, 2010

Koshish Karne Walon Ki
कोशिश करने वालों की
- हरिवंशराय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan) (few people think that it is from सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला")


लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार
- शिवमंगल सिंह सुमन (Shiv Mangal Singh Suman)


तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

आज सिन्धु ने विष उगला है
लहरों का यौवन मचला है
आज ह्रदय में और सिन्धु में
साथ उठा है ज्वार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

लहरों के स्वर में कुछ बोलो
इस अंधड में साहस तोलो
कभी-कभी मिलता जीवन में
तूफानों का प्यार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

यह असीम, निज सीमा जाने
सागर भी तो यह पहचाने
मिट्टी के पुतले मानव ने
कभी ना मानी हार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार

सागर की अपनी क्षमता है
पर माँझी भी कब थकता है
जब तक साँसों में स्पन्दन है
उसका हाथ नहीं रुकता है
इसके ही बल पर कर डाले
सातों सागर पार

तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार ।।
Chhip Chhip Ashru Bahaane Waalon
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों
- गोपालदास "नीरज" (Gopaldas Neeraj)


छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है
सपना क्या है, नयन सेज पर
सोया हुआ आँख का पानी
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों, डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से, सावन नहीं मरा करता है

माला बिखर गयी तो क्या है
खुद ही हल हो गयी समस्या
आँसू गर नीलाम हुए तो
समझो पूरी हुई तपस्या
रूठे दिवस मनाने वालों, फटी कमीज़ सिलाने वालों
कुछ दीपों के बुझ जाने से, आँगन नहीं मरा करता है

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर
केवल जिल्द बदलती पोथी
जैसे रात उतार चाँदनी
पहने सुबह धूप की धोती
वस्त्र बदलकर आने वालों, चाल बदलकर जाने वालों
चँद खिलौनों के खोने से, बचपन नहीं मरा करता है

लाखों बार गगरियाँ फ़ूटी,
शिकन न आयी पर पनघट पर
लाखों बार किश्तियाँ डूबीं,
चहल पहल वो ही है तट पर
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों,
लाख करे पतझड़ कोशिश पर, उपवन नहीं मरा करता है।

लूट लिया माली ने उपवन,
लुटी ना लेकिन गंध फ़ूल की
तूफ़ानों ने तक छेड़ा पर,
खिड़की बंद ना हुई धूल की
नफ़रत गले लगाने वालों, सब पर धूल उड़ाने वालों
कुछ मुखड़ों के की नाराज़ी से, दर्पण नहीं मरा करता है।
Hum Panchhi Unmukt Gagan Ke
हम पंछी उन्मुक्त गगन के
- ShivMangal Singh Suman (शिवमंगल सिंह सुमन)


हम पंछी उन्मुक्त गगन के
पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे
कनक-तीलियों से टकराकर
पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।

हम बहता जल पीनेवाले
मर जाऍंगे भूखे-प्यासे
कहीं भली है कटुक निबोरी
कनक-कटोरी की मैदा से ।

स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में
अपनी गति, उड़ान सब भूले
बस सपनों में देख रहे हैं
तरू की फुनगी पर के झूले ।

ऐसे थे अरमान कि उड़ते
नील गगन की सीमा पाने
लाल किरण-सी चोंच खोल
चुगते तारक-अनार के दाने ।

होती सीमाहीन क्षितिज से
इन पंखों की होड़ा-होड़ी
या तो क्षितिज मिलन बन जाता
या तनती सॉंसों की डोरी ।

नीड़ न दो, चाहे टहनी का
आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो
लेकिन पंख दिए हैं तो
आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।

एक भी आँसू न कर बेकार
- रामावतार त्यागी (Ram Avtar Tyagi)


एक भी आँसू न कर बेकार
जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है
यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है
और जिस के पास देने को न कुछ भी
एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है

कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार
जाने देवता को कौनसा भा जाय!

चोट खाकर टूटते हैं सिर्फ दर्पण
किन्तु आकृतियाँ कभी टूटी नहीं हैं
आदमी से रूठ जाता है सभी कुछ
पर समस्यायें कभी रूठी नहीं हैं

हर छलकते अश्रु को कर प्यार
जाने आत्मा को कौन सा नहला जाय!

व्यर्थ है करना खुशामद रास्तों की
काम अपने पाँव ही आते सफर में
वह न ईश्वर के उठाए भी उठेगा
जो स्वयं गिर जाय अपनी ही नज़र में

हर लहर का कर प्रणय स्वीकार
जाने कौन तट के पास पहुँचा जाए!

Monday, August 2, 2010

Kuch to kahi tut raha hai

Kuch to kahi tut raha hai

Kuch to kahi tut raha hai

Kuch to piche chut raha hai

Sukh bhi daman chod raha hai

Duriyo ka darr baad raha hai

Kuch to kahi bikhar raha hai

Har purana pal guzar raha hai

Zindagi ka rukh badal raha hai

Judaai ka mausam araha hai

Dadkano ka silsila ruk raha hai

Saath chalte chalte haath chut rahe hai

Waqt jaise keh raha hai

tera dil tujse rooth raha hai

Sunday, August 1, 2010

Apna Bhi Nahi Lagta…


Apna Bhi Nahi Lagta…

Aa jaye kisi din tu aisa bhi nahi lagta..

Lakin wo tera wada jhota bhi nahi lagta..

Milta hai sakoon dil ko us yaar ke koche mai..

Har roz magar jana acha nahi lagta..

Dekha hai tujhe jab se bechain bohut hai dil..

Kehne ko koi tujh se rishta bhi nahi lagta

Kiya faisla karon us ke bare mai ab..
Align Center
Wo ghair nahi lakin Apna Bhi Nahi Lagta..!!

Mein to who lamha hu jo aj hai kal shyaad guzar jau


Mein to who lamha hu jo aj hai kal shyaad guzar jau

Waqt ne kaha ab to muskura de

Chahat ka mausam lauta usse to gale se laga le


Mene tere saath jo kiya who to ek sharahat thi

Shyaad dekhne tha tere pyar mei kitni kurbat thi


Pyar tere muje bhi pyara hai

Tere dard ke samne mei bhi hara


Preet teri jag se nirali hai

Phir bhi teri dil kyu sawali hai


Phir se meet milaya mene uska kuch to sila de

Tere dard ka sisila ab to mita de


Tab mene waqt se kaha,Tu kuch muje bhi bata

Kaise karu mei tera itebar


Kyo kehte hai log waqt nahi tharta

Chaho na chaho tu hai badalta


Tune dal di meri Zindagi kasmkash mei

Zindagi leke chod diya Zinda muje


Mei who dard O gum kaise bhul jao jo tune muje diye

Bhul bhi jau to phir se tere pass kyoi au


Tere kya tu waqt ha sab kuch tere saath hai

Zindagi lena aur Zindagi dena tere haath hai


Tu karta reh sitam jo karne hai

Mei to who lamha hu jo aj hai kal shyaad guzar jau………..

Humesha Muskura K Aansooun Ko Chupaya

Humesha Muskura K Aansooun Ko Chupaya
Ghum Ko Chupanay Ka Yehi Rasta Nazar Aaya

Kis Kis Ko Batatey Behtey Ashkon Ka Sabab
Kay Derd-e-dil, Dil Main Kis Ne Jagaya

Mehfilon Main Kahin Bhi Maza Na Raha
Rakha Dil Pay Pather To Khud Ko Sajaya

Baat Bay Baat Apni Aahain Daba Ker
Yaron Kay Dermiyan Kis Qadar Muskuraya

Na Thi Chah Kabhi Mujahy Mankashi Ki
Jaam-e-wafa Kisi Bay Wafa Nay Pilaya

Kya Muqadar Say Shikwa Kertey Rahain
Jo Qismat Main Tha Wohi Kuch To Paaya

Yeh Kis Mod Pe Aagaee Hain Umeedain
Kay Saaya-e-manzil Nazar Main Na Aaya

Apnoon Ne Palat Kay Dekha Tak Nahin
Ghairon Ne Aaker Galay Se Lagaaya

Acha Hua Kay Raaz Khul Hi Gaya
Dil-e-nadaan Pay Khanjar Kis Nay Chalaya …………

By – Unknown
Kaun kahata hai ke maut aayi to mar jaunga

kaun kahata hai ke maut aayi to mar jaunga
main to darya hun samandar mein utar jaunga

tera dar chor ke main aur kidhar jaunga
ghar mein ghir jaunga sahara mein bikhar jaunga

tere pahlu se jo uthunga to mushkil ye hai
sirf ik shaKhs ko paunga jidhar jaunga
ab tere shehar mein aunga musafir ki tarah
saya-e-abr ki manind guzar jaunga

tera paiman-e-wafa rah ki divar bana
warna socha tha ke jab chahunga mar jaun ga

charasazon se alag hai mera mayar ke main
zaKhm khaunga to kuch aur sanvar jaun ga

ab to Khurshid ko dube hue sadiyan guzrin
ab use dhundne main ta-ba-sahar jaunga

zindagi shamma ki manind jalata hun ‘Nadeem’
bujh to jaunga magar subah to kar jaunga

-Ahmed Nadeem Qasmi
Ye Pyara sa jo RISHTA hai

Ye Pyara sa jo RISHTA hai,
Kuch mera hai, Kuch tera hai,
Kahin Likha nahi,
Kahin Parha nahi,
Kahin Dekha nahi,
Kahin Suna nahi,
Phir bhi jana pehchana hai,
Kuch Mera hai, Kuch tera hai,
Kuch mausam sa,
Kuch ulbela sa,
Kuch apna sa,
Kuch begana sa,
Kuch mera hai, Kuch tera hai,
Kuch chanchal sa,
Kuch sharmila sa,
Kuch shokh sa,
Kuch sanjeeda sa,
Kuch mera hai, Kuch tera hai,
Kuch uljha howa,
Kuch suljha suljha,
Kuch masti bhara,
Kuch khafa khafa,
Kabhi maan dya, Kabhi aitabaar kya,
Sub kuch is per vaar dya,
Kuch mera hai, Kuch tera hai,
Ye Pyara sa jo RISHTA hai,

By Noor Afridi
FACTS TO MAKE EVERY INDIAN PROUD


Q. Who is the co-founder of Sun Microsystems?
Ans. Vinod Khosla



Q. Who is the creator of Pentium chip (needs no
Introduction as 90% of the today’s computers run on it)?
Ans. Vinod Dahm



Q. Who is the third richest man on the world?
Ans. According to the latest report Lakshmi Niwas Mittal
Is the 3rd richest man in world in 2005.


Q. Who is the founder and creator of Hotmail (Hotmail
Is world’s No.1 web based email program)?
Ans. Sabeer Bhatia


Q. Who is the president of AT & T-Bell Labs (AT &
T-Bell Labs is the creator of program languages such
As C, C++, Unix to name a few)?
Ans. Arun Netravalli


Q. Who is the GM of Hewlett Packard?
Ans. Rajiv Gupta


Q. Who is the new MTD (Microsoft Testing Director)
Of Windows 2000,responsible to iron out all initial problems?
Ans. Sanjay Tejwrika


Q. Who are the Chief Executives of CitiBank, Mckensey & Stanchart?
Ans. Victor Menezes, Rajat Gupta, and Rana Talwar.


*We Indians are the wealthiest among all ethnic groups in
America, even faring better than the whites and the natives.
There are 3.22 millions of Indians in USA (1.5% of population). YET,
38% of doctors in USA are Indians.
12% scientists in USA are Indians.
36% of NASA scientists are Indians.
34% of Microsoft employees are Indians.
28% of IBM employees are Indians.
17% of INTEL scientists are Indians.
13% of XEROX employees are Indians.
Sabko Chorneka Mann Karta Hai….

Sabko Chorneka Mann Karta Hai
Sabse Kahi Dur Jaaneka Mann Karta Hai

Na Kisise Pyar Karu
Na Kisike Pyar Ke Kabil Banu
Na Kisise Dil Lagau
Na Kisika Dil Thodu
Na Kisipe Aitbar Karu
Na Kisika Intezar

Sabse Naatha Thodneka Mann Karta Hai

Na Kisise Baat Karu
Na Koi Wada Karu
Na Koi Wafa Ki Ummeed Karu
Na Kisise Bewafai Karu
Na Kisiko Apna Kahu
Na Kisiko Yaadon Mein Basau

Khud Se Pyar Ko Dur Karneka Mann Karta Hai

Na Koi Dua Karu Na Kisipe Yakeen
Na Koi Rasta Dundu Na Koi Manzil
Na Koi Sapna Sajau Na Koi Iraade
Raat Ko Neendka Na Subah Utneka
Na Khudse Na Koi Parayonse

Khud Se Dur Jaaneka Mann Karta Hai
Duniya Se Alag Honeka Mann Karta Hai

Na Dukh Pe Aansoo Bahau
Na Khushi Se Jhoom Uttu
Na Kisike Milnepe Muskurau
Na Kisike Bichadneka Shoak Manau
Na Khud Keliye Rou Na Kisi Aur Keliye

Kahi Khojaneka Mann Karta Hai
Haqeekat Se Muh Modneka Mann Karta Hai
kaash ke mujh sey bhi kisiko pyar hota

kaash ke mujh sey bhi kisiko pyar hota,
kaash ke mere liye bhi kisika dil bekarar hota,
kaash ke mujhe bhi koi apni yaadon mein laata,
apne khwabon mein basata ,ankhon mein chupaata.



kaash ke mujhse bhi kabhi koi izhaar karta ,
kaash ke mere liye bhi koi bechaain hota,
kaash ke mujhe bhi koi apne dil mein utarta ,
apni sanson mein samata , meri duniya ko mehkaata.



kaash ke mere bhi sapne kabhi sach hote,
kaash ke mere bhi armaan pure hote
kaash ke mujhe bhi kabhi mil jaata koi,
dekhti use main harpal , rehti khoye khoye.



zindagi pyar bina adhuri si hoti hai,
ek saathi bina suni suni hoti hai,
kaash ke mujhe bhi kisika saath mila hota,
kaash ke mere zindagi me bhi kisi ka sath hota
Yun to guzar raha hai har ik pal khushi ke sath


Yun to guzar raha hai har ik pal khushi ke sath,
Phir bhi koi kami si hai kyun jindgi ke sath.

Rishte wafaein dosti sab kuch to pass hai,
Kya baat hai pata nahi, dil kyun udass hai,
Har lamha hai haseen, nayi dilkashi ke sath
Phir bhi koi kami si hai kyun jindgi ke sath.

Chahat bhi hai sukun bhi hai, dilbari bhi hai,
Aankhon mein khawab bhi hai, labon par hasin bhihai
Dil ko nahi hai koi shikayat , kisi ke sath
Phir bhi koi kami si hai kyun jindgi ke sath.

Yun to guzar raha hai har ik pal khushi ke sath,
Phir bhi koi kami si hai kyun jindgi ke sath.

Socha tha jaisa waisa hi jivan to hai magar,
ab aur kis talash mein bechain hia nazar,
Kudrat bhi meharbaan hai dariyadillli ke sath,
Fhir bhi koi kami si hai kyun jindgi ke sath.

Yun to guzar raha hai har ik pal khushi ke sath,
Fhir bhi koi kami si hai kyun jindgi ke sath.
Hum ne pyaar main paaya to kyaa paya


Kabhi khud ro diye kabhi Tum ko Rulaya


Halat-e-ghum main beh gaya jho aansoon


Who Zindagi main phir kabhi na behne paya


Saza mujhe mili aur jaza unhain bi


Aisa bhi kya insaaf me hai sir jhukaya


Himmat nahee thi us main Saath mere dene ki


Ab tak na jaane vo kaise chal paya




Kisi ajnabi ko mera likha suna raha tha woh

Bikhre hue khawabon ke Purzey udha raha tha woh


Umr bhar pista raha who rishtoon ki chaki mein

Baaqi rahe rishtoon se daaman churra raha tha woh


Apni zidd to woh puri na kar saka

Ruthey huway bachoon ko mana raha tha woh


Sehra me khile phool ko bachane ke liye

Apne ashkoon se uski pyaas mita raha tha woh


Uski yaadoon ko kuch is tarah bhula raha tha

Apne haathoon apna likha mita raha tha woh


Sirf kirdaar hi to badle they usne

Apni hi kahani suna raha tha woh !!!




Hum apni deewangi se jaane jaate hain

Wo apni berukhi se pehchaane jaate hain


Roz miltey hai lekin, kuchh kehte sunte nahi

Mere saamne wo meri dhadkan badhaane aate hain


Shab bhar intzaar mein hum taare dekhaa karte hai

Sabera hone se pehle wo chand bujhane aate hain


Bas ek nazar ke liye hum din bhar taraste hain

Wo shaam ko gamalon ko paani pilaane aate hain


Mere is haalaat pe hansanaa nahi MUSAFIR too

Ishq main sabke saame aise zamaane aate hain


Ram Kumar Chandak
MERE TOOTE HUE DIL KO, SAHARA KON DEGA

MERI TOOFAAN ME KASHTI, KINARA KON DEGA


YEH KESE MOR PE LAAI HA MUJKO ZINDIGANI

ADHOORI SEE LIKHI GYEE HA KYUN MERI KAHANI


HA AB KIS RAAH PE CHALNA ISHARA KON DEGA
MERE TOOTE HUE DIL KO SAHARA KAUN DEGA


MAIN HOON OUR SATH MERE AB MERI TANHAAYAN HAIN

MERI TAQDEER SE MUJKO MILI RUSWAYIAN HAIN


MERI ANKHON KO KHUSHION KA NAZARA KAUN DEGA

MERE TOOTE HUE DIL KO SAHARA KAUN
Yatra Aur Yatri
यात्रा और यात्री
- हरिवंश राय बच्चन (Harivansh Rai Bachchan)

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता

पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है

एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता

शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हुए है
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था

घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा

थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था

पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते

शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बनाए

किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लिए मजबूर करते

और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना
और भूली यामिनी भी
तारिकाओं को जगाना

एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन

मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना

एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है

यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहयाई

साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है

सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!
Din Kuch Aise Gujarta Hai Koi
दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
- गुलजार


दिन कुछ ऐसे गुजारता है कोई
जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शजर पे फल शायद
फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नजर में लहू के छींटे हैं
तुम को शायद मुघालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे
जैसे हम को पुकारता है कोई ।
Hazaaron Khwaishein Aisi Ki Har Khwaish Pe Dam Nikle
- मिर्जा गालिब (Mirza Ghalib)


हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले

--
चश्म-ऐ-तर - wet eyes
खुल्द - Paradise
कूचे - street
कामत - stature
दराजी - length
तुर्रा - ornamental tassel worn in the turban
पेच-ओ-खम - curls in the hair
मनसूब - association
बादा-आशामी - having to do with drinks
तव्वको - expectation
खस्तगी - injury
खस्ता - broken/sick/injured
तेग - sword
सितम - cruelity
क़ाबे - House Of Allah In Mecca
वाइज़ - preacher
कलम, आज उनकी जय बोल
- रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar)

जो अगणित लघु दीप हमारे
तुफानों में एक किनारे
जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन
मांगा नहीं स्नेह मुंह खोल
कलम, आज उनकी जय बोल

पीकर जिनकी लाल शिखाएं
उगल रही लपट दिशाएं
जिनके सिंहनाद से सहमी
धरती रही अभी तक डोल
कलम, आज उनकी जय बोल
Raat Yo Kahne Laga Mujse Gagan ka Chaand
- By Ramdhari SIngh Dinkar



रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव है ।
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते ।
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है ।
किन्तु, फिर भी धन्य ठहरा आदमी ही तो
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी,
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाता हूँ ।
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाता हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है ।
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे
रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे ।
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

Door se dekha,
Kisi ke sath ja raha tha vo.
Awaaz aa rahi thi jaise,
Gunguna raha tha vo.
Masti me chalta aise,
Itraa raha tha vo.
Nazdeek pahunche to,
Tasweer hi badal gayi.
Na chahte huye bhee,
Aankhe machal gayi.
Akela hi tha vo us din,
Ladkhada raha tha vo.
Vo ro raha tha us din,
Ghabra raha tha vo.
Dooor se na pahchaana,
Vo kaun shakhs tha,
Kohra ghana tha us din,
Vo hamara hi aks tha.
Khoobsurat Hain Wo Log

Khubsoorat hain wo Lub
Jo Pyaari Batein kertey hain

Khubsoorat hai wo Muskurahat
Jo Dusaron k Chehron per bhi Muskan saja de

Khubsoorat hai wo Dil
Jo kisi ke Dard ko Samjhey
Jo kisi ke Dard mai Tadpey

Khubsoorat hain wo Jazbat
Jo kisi ka Ehsaas karein

Khubsoorat hai wo Ehsaas
Jo kisi ke Dard Ma dawa baney

Khubsoorat hain wo Batein
Jo kisi ka Dil na Dukhaein

Khubsoorat hain wo Aankhein
Jin mai Pakeezgi ho, Sharm-o-Haya ho

Khubsoorat hain wo Aansoo
Jo kisi ke Dard ko Mehsoos ker ke Beegh jaein

Khubsoorat hain wo Haath
Jo kisi ko Mushkil Waqt mai Thaam lein

Khubsoorat hain wo Qadam
Jo kisi ki Madad ke liye aagey badhein !!!!!

Khubsooart hai wo Soch
Jo kisi ke liye acha Sochey

Khubsoorat hai wo Insan

Jis ko KHUDA ne ye
Khubsoorati ada ki!!!

Dard Kaisa Bhi Ho Ankhe Nam Na Karo
Raat Kaali Sahi Koi Gham Na Karo
~~--**--~~

Ek Sitara Bano Jagmagatay Raho
Zindagii Mein Sada Muskuratay Raho
~~--**--~~

Baatni Hai Agar Baant Lo Har Khushi
Gham Na Zahir Karo Tum Kisi Par Kabhi
~~--**--~~

Dil Ki Gehraai Mein Ghum Chupatay Raho
Zindagii Mein Sada Muskuratay Raho
~~--**--~~

Ashk AnMoL Hain Kho Na Dena Kahin
In Ki Her Boond Hai Motiyoon Se Haseen
~~--**--~~

In Ko Har Ankh Se Tum Churatay Raho
Zindagii Mein Sada Muskuratay Raho
~~--**--~~

Faasley Kam Karo Dil Milatey Raho


खुशियों के श्रोत का उदगम बता दो,
जीवन में आनंद का संगम करा दो.
देह के आत्मा को तृप्त कर दे जो,
उस मूल्यवान वस्तु से मिलन करा दो.

तलाश में जिसके संतो के भक्ति लीन,
दार्शनिको के विचार जिस आस्था में विलीन.
कृष्ण राधा के प्रेम संबंधो का यकीन,
उनके बीच का वो अमर बंधन हसीन.

अरस्तु के चमत्कारिक ज्ञान का भंडार,
आइन्स्टीन के काया पलट खोजो का अम्बार.
मायकल एंजलो की प्रतिभाशाली कला,
महात्मा बुद्ध को जिस शक्ति से ज्ञान मिला.

क्रिस्त्लर की मधुर वो वायलिन की तान,
कबीर के गूढ़ रहस्यवादी दोहो की शान.
सेक्सपीअर की जग प्रसिद्ध कविताये,
वो प्रेरणा जिससे लिखी महान रचनाये.

खुशियों के श्रोत का उदगम बता दो,
जीवन में आनंद का संगम करा दो.
देह के आत्मा को तृप्त कर दे जो,
उस मूल्यवान वस्तु से मिलन करा दो
अपने दिल को पत्थर का बना कर रखना ,
हर चोट के निशान को सजा कर रखना ।

उड़ना हवा में खुल कर लेकिन ,
अपने कदमों को ज़मी से मिला कर रखना ।

छाव में माना सुकून मिलता है बहुत ,
फिर भी धूप में खुद को जला कर रखना ।

उम्रभर साथ तो रिश्ते नहीं रहते हैं ,
यादों में हर किसी को जिन्दा रखना ।

वक्त के साथ चलते-चलते , खो ना जाना ,
खुद को दुनिया से छिपा कर रखना ।

रातभर जाग कर रोना चाहो जो कभी ,
अपने चेहरे को दोस्तों से छिपा कर रखना ।

तुफानो को कब तक रोक सकोगे तुम ,
कश्ती और मांझी का याद पता रखना ।

हर कहीं जिन्दगी एक सी ही होती हैं ,
अपने ज़ख्मों को अपनो को बता कर रखना ।

मन्दिरो में ही मिलते हो भगवान जरुरी नहीं ,
हर किसी से रिश्ता बना कर रखना ।

मरना जीना बस में कहाँ है अपने ,
हर पल में जिन्दगी का लुफ्त उठाये रखना ।

दर्द कभी आखरी नहीं होता ,
अपनी आँखों में अश्को को बचा कर रखना ।

मंज़िल को पाना जरुरी भी नहीं ,
मंज़िलो से सदा फासला रखना ।

सूरज तो रोज ही आता है मगर ,
अपने दिलो में ' दीप ' को जला कर रखना




आशावाद का दीप जला.......

आशावाद का॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰ दीप जलाकर,
तू जिस राह॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰निकल जायेगा,
घुप्प अंधेरी॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰राहों को भी,
रोशन कर॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰कुछ कर जायेगा,
कर फैसला॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰मत घबराना
यह सोच॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰मेरा क्या होगा
इस पथपर॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰यह समझ ले तू
नहीं लील सकता॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰अंधेरा॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰वह भले ही हो
कितना गहरा॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰बस
मन में रखना॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰दृढ़ता और विश्वास
बढ़ा कदम आगे॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰देखना॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰टूट जायेगा
॰॰॰॰॰॰॰॰॰अहंकार॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰अंधकार का
और वह भी॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰नजर आयेगा
छोड़ अहंकार॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰उजाले में खो
जाने को॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰बढा कदम
बढा कदम॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰बढा कदम
देखना वह भी आ जायेगा
तेरे पीछे ॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰ उजाले में
॰॰॰॰॰॰॰ खो जाने को ॰॰॰॰॰॰॰




दोस्ती दुनिया की वो ख़ुशी है,
जिसकी ज़रूरत हर किसी को हुई है,
गुजार के देखो
कभी अकेले ज़िन्दगी,
फिर खुद जान जाओगे के दोस्ती के बिना ज़िन्दगी भी अधूरी
है.
कीसी का दिल तोड़ना हमारी आदत नहीं
कीसी का दिल दुखाना हमारी फितरत में
नहीं
भरोसा रखना हम पर तुम
दोस्त कह कर कीसी को यूँ ,हम बदलते नहीं
हर
ख़ुशी दिल के करीब नहीं होती,
ज़िन्दगी गमो से दूर नहीं होती,
ये दोस्त मेरी
दोस्ती को संभल कर रक,
सच्ची दोस्ती हर किसी को नसीब नहीं होती.
तेरी दोस्ती
हम इस तरह निभाएंगे तुम रोज़ खफा होना
हम रोज़ मनायेंगे पर मान जाना मनाने
से
वरना यह भीगी पलकें ले के कहा जायेंगे.
इतना प्यार पाया है आप से..
उस
से ज्यादा पाने को जी चाहता है.
नजाने वो कौन सी खूबी है आप में.
की आप से
दोस्ती निभाने को जी चाहता है…………….
Zindagi se seekhna..



Jeetna..phir haarna..



Haar ke ..phir jeetna..



HAR HAAL MUSKURAANA..







Dard sahna seekhna..



Pyaar dena seekhna..



Apni nam aankhein chhupa kar..



Muskuraana seekhna..







Zindagi rukti nahi..



Tum saath chalna seekhna..



Jo koi maange sahaara..



Thaam lena seekhna..







Zindagi mein kuch bhi ho..



Khud ko dekar ke sahaara..



Sabka sambal banna seekhna..



Haarna ya jeetna…



HAR HAAL MUSKURAANA

मंजिलें भी उसकी थी
रास्ता भी उसका था
एक में अकेला था
काफिला भी उसका था
साथ-साथ चलने कि सोच भी उसकी थी
फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था
आज क्यों अकेला हूँ में ?
दिल सवाल करता है यह ....
लोग तो उसके थे , क्या खुदा भी उसका था

Saturday, July 31, 2010


दिलों में दर्द लब पे तश्न्गी है यहाँ
जिन्दगी कुछ भी नही सिर्फ़ बेबसी है यंहा
शोर है भीड़ है हंगामा कत्लेआम के बीच
तुम्हारी साँस अभी है यही खुशी है यहाँ
वो बात झूठी थी जो मैं एलान किया करता था
फकत जो तू कहे-बोले वही सही है यहाँ
कोई तो हद हो और कितना दर्द पी जायें
तमाम गम है और तनहा आदमी है यहाँ
मैं एक रोज मोहब्बत भी करके देखूंगा
सुना है दिल का लगाना भी दिल्लगी है यहाँ
हमारे गम से वो गाफिल नही हैं फ़िर भी बसर
कभी जो पूछे तो कहना हंसी खुशी है यहाँ





कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिये

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

जियें तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के लिये
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिये
एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..

दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..
दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..

जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..
साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..

वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..
तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..

ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..
मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..

बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा "अभी"..
हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..
खुशी हो या गम, बस तेरी ख़ुशी चाहता हूँ ***






हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले




दोस्ती शायद ज़िंदगी होती है
जो हर दिल में बसी होती है
वैसे तो जी लेते है सभी अकेले मगर,
फिर भी ज़रूरत इनकी हैर किसी को होती है

तन्हा हो कभी तो मुझको ढुँदना
दुनिया से नही अपने दिल से पूछना,
आस पास ही कही बसे रहते है
यादों से नही साथ गुज़रे लम्हो से पूछना..!!

ख़वाईश ही नही अल्फ़ाज़ की,
चाहत को तो ज़रूरत है बस एहसास की,
पास होते तो मंज़र ही क्या होता,
दूर से ख़बर है हुमए आपकी हर साँस की..!!

दिल जीत ले वो जिगर हम भी रखते है
कतल कर दे वो नज़र हम भी रखते है
आपसे वादा है हुमारा हमेशा मुस्कराने का,
वरना आँखो में समुंदर हम भी रखते है

प्यार आ जाता है आँखों में रोने से पहले,
हर ख़वाब टूट जाता है सोने से पहले,
इश्क़ है गुनाह एह तो समझ गाये
काश कोई रोक लेता एह गुनाह होने से पहले..!!

पलकों से उठा के ये ख़वाब,
सजाए है क़दमों में तेरे,
संभाल के रखना क़दम,
कही कुचल ना जाए ख़वाब ये मेरे

Sunday, May 16, 2010

हमने भी ज़माने के कई रंग देखे है
कभी धूप, कभी छाव, कभी बारिशों के संग देखे है
जैसे जैसे मौसम बदला लोगों के बदलते रंग देखे है
ये उन दिनों की बात है जब हम मायूस हो जाया करते थे
और अपनी मायूसियत का गीत लोगों को सुनाया करते थे
और कभी कभार तो ज़ज्बात मैं आकर आँसू भी बहाया करते थे
और लोग अक्सर हमारे आसुओं को देखकर हमारी हँसी उड़ाया करते थे
"अचानक ज़िन्दगी ने एक नया मोड़ लिया
और हमने अपनी परेशानियों को बताना ही छोड़ दिया

"अब तो दूसरों की जिंदगी मैं भी उम्मीद का बीज बो देते
हैऔर खुद को कभी अगर रोना भी पड़े तो हस्ते हस्ते रो देते है



इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,

नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,

इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी,

आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है।

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी,

यह अंधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है।

निर्वचन मैदान में लेटी हुई है जो नदी,

पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है।

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर,

और कुछ हो या न हो,

आकाश-सी छाती तो है।




आदमी यह सोचता है, काश अपने पंख होते,


तो गगन में उड़ रहे हम खग-सदृश निःशंक होते ।


आज जीवन में हमारे उलझनें जो आ पड़ीं हैं,


और यदि सामर्थ्य से लगने लगी विपदा बड़ी है ।


दीप यदि उम्मीद का , होकर विवश बुझने लगा है,


और मन का दीप्त कोना ज्योति से चुकने लगा है ।


नीति यह कहती नहीं है हारकर पथ छोड़ देना,


श्रेय है तब राह का हर एक पत्थर तोड़ देना ।


आदमी के सामने कोई विपद कबतक टिकेगा ?


यदि हिमालय भी खड़ा हो सामने, पल में मिटेगा ।


कर-द्वयों से तोड़ लाते तुम्हें ,


नभ के चाँद- तारोंसोच लो,


क्या कर गुजरते,


हाथ होते गर हज़ारों ।



खुदा से क्या मांगू तेरे वास्ते

सदा खुशियों से भरे हों तेरे रास्ते

हंसी तेरे चेहरे पे रहे इस तरह

खुशबू फूल का साथ निभाती है जिस

तरह सुख इतना मिले की तू दुःख को तरसे

पैसा शोहरत इज्ज़त रात दिन बरसे

आसमा हों या ज़मीन हर तरफ तेरा नाम हों

महकती हुई सुबह और लहलहाती शाम हो

तेरी कोशिश को कामयाबी की आदत हो जाये

सारा जग थम जाये तू जब भी गए

कभी कोई परेशानी तुझे न सताए

रात के अँधेरे में भी तू सदा चमचमाए

दुआ ये मेरी कुबूल हो जाये

खुशियाँ तेरे दर से न जाये

इक छोटी सी अर्जी है मान लेना

हम भी तेरे दोस्त हैं ये जान लेना

खुशियों में चाहे हम याद आए न आए

पर जब भी ज़रूरत पड़े हमारा नाम लेना

इस जहाँ में होंगे तो ज़रूर आएंगे

दोस्ती मरते दम तक निभाएंगे